राजा शांतनु महाभारत के एक प्रमुख पात्र थे। वे ब्रह्मदेव के श्राप के कारण पृथ्वी पर शांतनु के रूप में जन्म लिए। वे हस्तिनापुर नरेश प्रतीप के पुत्र थे राजा प्रतीप के पश्चात शांतनु राजा बने। शांतनु पितामह भीष्म के पिता एवं पांडवों, कौरवों के परदादा थे। आगे हम कुरूवंश का प्रारंभ और राजा शांतनु की कथा को जानेंगे।
कुरुवंश की शुरुआत –
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि , अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरुवंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए और यहीं से कुरु वंश की शुरुआत हुई।
कुरुवंश की शुरुआत महान प्रतापी, शूरवीर और तेजस्वी राजा कुरु से हुई। कुरुवंश के प्रथम पुरुष थे। राजा कुरू के नाम पर कुरुवंश की शाखाएं निकली और विकसित हुई। कुरूवंश में एक से एक महान प्रतापी और तेजस्वी वीर पैदा हुए। पांडवों और कौरवों ने भी कुरु वंश में जन्म लिया था। महाभारत का युद्ध भी कुरूवंशियों के बीच हुआ था।
कुरुवंश में ही राजा शांतनु का जन्म हुआ था। जिसकी जीवन कथा के बारे में आज हम जानेंगे।
राजा शांतनु का जन्म
राजा शांतनु महाभारत एक प्रमुख पात्र है ।वे ब्रह्मदेव के श्राप के कारण पृथ्वी पर शांतनु के रूप में जन्म लिए। वे हस्तिनापुर नरेश प्रतीप के पुत्र थे राजा प्रतीप के पश्चात शांतनु राजा बने। शांतनु पितामह भीष्म के पिता एवं पांडवों, कौरवों के परदादा थे।
राजा शांतनु और गंगा विवाह-
एक बार राजा शांतनु गंगा तट पर शिकार खेल रहे थे। उसी समय गंगा वहां प्रकट हुई। शांतनु गंगा को देख उस पर मोहित हो गए और गंगा के पास चले गए। गंगा के पास जाकर शांतनु ने उसके सामने हस्तिनापुर की पटरानी बनने का प्रस्ताव रखा ।
प्रथम पुत्र का जन्म
कुछ समय पश्चात गंगा ने अपनी कोख से एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। जन्म के पश्चात गंगा अपने पुत्र को लेकर गंगा तट पर चली जाती है। गंगा को अपने पुत्र के साथ तट पर जाते देख शांतनु भी उसके पीछे-पीछे चले जाते हैं। गंगा अपने पुत्र को स्वयं अपनी जल में बहा देती है। शांतनु यह देख रहे थे पर शांतनु कुछ ना कर पाए क्योंकि वह वचनबद्ध थे।
गंगा ऐसे ही एक-एक करके अपने कोख से जन्म लेने वाले पुत्रों को स्वयं अपने ही जल में बहा देती है, शांतनु तट पर खड़े चुपचाप देखने के अलावा कुछ ना कर पा रहे थे। वे एक विवश मछली की तरह तड़प रहे थे क्योंकि उनके गले में स्वयं उनकी वचन का कांटा अटका फंसा था । वे गंगा को कुछ नहीं पूछ सकते थे।
आठवें पुत्र का जन्म
समय अनुसार गंगा अपने आठवें पुत्र को जन्म देती है। गंगा अपने आठवें पुत्र को लेकर अपने जल में बहाने के लिए चली जाती है। तब शांतनु भी गंगा के पीछे – पीछे जाते हैं।
इस बार शांतनु यह सह ना सके और गंगा का ऐसा करने से रोक देते हैं। गंगा बोलती है – आप वचनबद्ध हैं महाराज! इसके उत्तर में शांतनु कहते हैं कि जिसने तुम्हें वचन दिया था वह एक चक्रवर्ती सम्राट था पर जो तुम्हें रोक रहा है वह एक पिता है। तुम एक एक करके मेरे साथ पुत्र की हत्या कर चुकी हो पर अब मैं अपने इस आठवें पुत्र को नहीं मरने दूंगा।
शांतनु और गंगा का वियोग
शांतनु ने प्रश्न पूछ लिया और अपना वचन तोड़ दिया। गंगा ने शांतनु के प्रश्न का उत्तर दिया और अपने पुत्र को शांतनु से यह कह कर अपने साथ ले गई कि समय आने पर आप के आठवें पुत्र को आपको लौटा दूंगी। गंगा के जाने के पश्चात शांतनु का जीवन अर्थहीन हो गया उसकी दिशाएं खो गई । उसके जीवन में ही बस एक चीज रह गई अपने पुत्र देवव्रत के दर्शन की आस।
गंगा का आठवें पुत्र को वापस सौंपना
देखते ही देखते गंगा की प्रतीक्षा में 16 वर्ष बीत जाते हैं। एक दिन शांतनु राजभवन की खिड़की से गंगा को देख रहे थे। उसी समय वह देखते हैं कि तीरो की एक बांध ने शक्तिशाली गंगा को रोक दिया है। यह देख शांतनु राज महल से बाहर आए और कंधे से धनुष लिया धनुष पर बाण लगाया और कमान खींचने ही वाले थे की गंगा वहां प्रकट हुई।
गंगा को देख शांतनु धनुष नीचे कर लेते हैं। शांतनु गंगा के पास जाते हैं और गंगा को राजमहल वापस चलने के लिए बोलते हैं परंतु गंगा यह नहीं कर सकती थी । गंगा अपने आप के पुत्र देवव्रत को शांतनु को सौंप देती है और शांतनु के जीवन से सदा के लिए चली जाती है। समय के साथ देवव्रत की वीरता और साहस को देख शांतनु उसे हस्तिनापुर का युवराज नियुक्त कर देते हैं।
शांतनु और सत्यवती का परिचय
एक दिन शांतनु यमुना तट पर शिकार खेल रहे थे। उसी समय उसने सत्यवती को तट पर देखा और रथ से उतरकर वे सत्यवती पास चले गए। शांतनु सत्यवती के पास जाकर उससे उसका परिचय पूछते हैं सत्यवती उसे अपना परिचय दे देती है । शांतनु सत्यवती पर मोहित हो गए थे वह रोज यमुना तट पर जाते और सत्यवती के साथ यमुना पार करते थे।
शांतनु का विवाह प्रस्ताव
एक बार शांतनु सत्यवती के पास विवाह का प्रस्ताव रखते हैं।इस पर सत्यवती कहती है कि मेरे विवाह का निर्णय मेरे पिता लेंगे। यह सुन शांतनु कहते हैं कि मैं तुम्हारी मन की बात जाने बिना तुम्हारे पिता के पास नहीं जा सकता। सत्यवती अपनी मन की बात शांतनु को बता देती है। शांतनु सत्यवती से विवाह का प्रस्ताव लेकर उसके पिता दासराज के पास चले गए शांतनु ने सत्यवती से विवाह का प्रस्ताव उसके पिता दास राज के पास रखा। दासराज कहते हैं कि यह तो बड़ी सौभाग्य की बात है पर मेरी एक शर्त है कि सत्यवती के पुत्र आपके बाद राजा बनेगा।
शांतनु कहते है – परंतु मैं गंगापुत्र देवव्रत को युवराज घोषित कर चुका हूं । जरा विचार कीजिए दासराज आप क्या कह रहे हैं मैं अपने पुत्र देवव्रत के साथ यह अन्याय नहीं कर सकता। मैं देवव्रत के विषय में वचनबद्ध हूं। परन्तु दासराज को यह स्वीकार नहीं था इसलिए शांतनु यह कह कर वहां से चले गए कि भरत वंश का शांतनु एक का अधिकार छीन कर दूसरे को सौंपने का न्याय नहीं कर सकता।
शांतनु आप चिंतित रहने लगे थे। शांतनु की स्थिति देख देवव्रत ने एक दिन उनसे पूछा कि आप इतने चिंतित क्यों है पर शांतनु ने उसे कुछ भी नहीं बताया। देवव्रत शांतनु की सारथी से सारी बातें पूछ ली और दास आज के पास पहुंच गए। दास राज ने उन्हें सारी बातें बता दी और देवव्रत के सामने भी वही शर्त रखा जो शांतनु के सामने रखा था ।
देवव्रत की प्रतिज्ञा
देवव्रत कहते हैं कि महाराज इस विषय में वचनबद्ध है लेकिन मैं नहीं, मैं आपको यह वचन देता हूं कि महाराज के पश्चात देवी सत्यवती और पिता महाराज के जेष्ठ पुत्र ही राज सिंहासन संभालेंगे । यह कह कर देवव्रत प्रतिज्ञा लेते हैं । इस प्रतिज्ञा के कारण ही देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा।
शांतनु का भीष्म को वरदान
भीष्म सत्यवती के साथ हस्तिनापुर आ जाते हैं। जब भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के विषय में बताते हैं तब शांतनु कहते हैं कि राजगद्दी के विषय में भारतवंशियों को शकुंतला पुत्र भरत से परंपरा मिली है कि राजगद्दी का अधिकारी जन्म से नहीं कर्म से जुड़ा है पर जिस ने अभी तक जन्म ही नहीं लिया उसका कर्म क्या ? लेकिन भीष्म ने प्रतिज्ञा ले ली थी शांतनु भी अब कुछ नही कर सकते थे। शांतनु ने उसी समय भीष्म को वरदान दिया कि तुम जब इच्छा ना करो तुम मृत्युलोक को नहीं त्यागोगे। तुम जब तक चाहो जिओगे तुम्हारी इच्छा के बिना मृत्यु तुम्हारे पास नहीं आएगी।
शांतनु का अंतिम प्रणाम
समय अनुसार हस्तिनापुर में दो दीप जले सत्यवती ने दो पुत्रों को जन्म दिया चित्रांगद और विचित्रवीर्य । परंतु खुश होने के बजाय शांतनु को दिल में अंधेरा बढ़ता ही गया। शांतनु अब थक गए थे और पूरी तरह से टूट गए थे।भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान देने वाला शांतनु अब स्वयं अपनी मरण के लिए वरदान देने वाले खोज रहे थे ।
धीरे-धीरे शांतनु कमजोर हो गए। शांतनु के ह्रदय में जो अंधकार छाया था वह इतना बढ़ा कि वह सारे राज महल में छा गया और शांतनु को मृत्यु शैया पर लिटा दिया।वह कुछ ना कह पाए केवल उनकी बोलती आंखों ने सत्यवती को अंतिम प्रणाम किया और उससे पैदा हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य को भीष्म को सौंपकर परलोक सिधार गए।
[…] शांतनु जब बड़े हुए तो जंगल में उन्होंने गंगा को देखा और उनसे शादी की इच्छा जताई। […]