अर्जुन के 84 श्लोक – पूरी सूची
प्रिय पाठक, आपकी मांग पर हम अर्जुन द्वारा कहे गए सभी 84 श्लोकों को उनके अध्याय, श्लोक संख्या और हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं। ये वे श्लोक हैं जिनके माध्यम से अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न पूछे, अपनी दुविधा व्यक्त की और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया।
अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग
इस अध्याय में अर्जुन युद्धभूमि में अपने ही परिजनों, गुरुओं और बंधुओं को देखकर विषाद और करुणा से भर जाते हैं। वे युद्ध करने से इनकार कर देते हैं। ये श्लोक अर्जुन के मानसिक संघर्ष को दर्शाते हैं ।
1.21-22 – रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलें
अर्जुन उवाच –
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
हिन्दी अर्थ: हे अच्युत! कृपया मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में इस प्रकार खड़ा करें कि मैं युद्ध के लिए उत्सुक इन खड़े हुए योद्धाओं को देख सकूँ और यह जान सकूँ कि इस युद्ध-प्रयास में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है ।
1.26-27 – स्वजनों को देखकर करुणा
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि॥
हिन्दी अर्थ: वहाँ अर्जुन ने दोनों सेनाओं में पिताओं, दादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और हितैषियों को खड़ा देखा ।
1.28-29 – शारीरिक लक्षण
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! इस युद्ध के लिए उत्सुक अपने जनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कँपकँपी हो रही है और रोमांच खड़े हो रहे हैं ।
1.30 – गाण्डीव धनुष का गिरना
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
हिन्दी अर्थ: गाण्डीव धनुष हाथ से छूट रहा है और त्वचा जल रही है। मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन भ्रमित हो रहा है ।
1.31 – युद्ध में कोई लाभ न दिखना
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! युद्ध में अपने ही जनों को मारकर मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता। मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य और न ही सुख ।
1.32-34 – किसके लिए राज्य और सुख?
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च॥
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः॥
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥
हिन्दी अर्थ: हे गोविन्द! उस राज्य, भोग और जीवन का क्या लाभ, जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही लोग प्राण और धन त्यागकर युद्ध में खड़े हैं—गुरुजन, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साले और अन्य संबंधी ।
1.35 – तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
हिन्दी अर्थ: हे मधुसूदन! ये लोग चाहे मुझे मार डालें, फिर भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता—चाहे तीनों लोकों के राज्य के लिए हो, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या ।
1.36-37 – पाप का भय
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्रपुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही लगेगा। इसलिए हमें अपने बांधव धृतराष्ट्रपुत्रों को नहीं मारना चाहिए। हे माधव! स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं ?
1.38-39 – मोह और लोभ से ग्रस्त शत्रु
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! यद्यपि ये लोभ से ग्रस्त चित्त वाले लोग कुलक्षय से उत्पन्न दोष और मित्रद्रोह के पाप को नहीं देखते, तो भी हमें कुलक्षय का दोष देखकर इस पाप से क्यों नहीं हटना चाहिए ?
1.40-41 – कुलक्षय के दुष्परिणाम
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! कुल के नष्ट होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल अधर्म से ग्रस्त हो जाता है। हे वार्ष्णेय! अधर्म के बढ़ने पर कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं और स्त्रियों के भ्रष्ट होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ।
1.42-43 – वर्णसंकर के दोष
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
हिन्दी अर्थ: वर्णसंकर कुलघातियों और कुल दोनों के लिए नरक के कारण है। इनके पितर पिण्ड-जल की क्रियाओं से वंचित होकर गिर जाते हैं। कुलघातियों के इन दोषों से वर्णसंकर उत्पन्न होता है और शाश्वत जातिधर्म तथा कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं ।
1.44-45 – नरक का वास
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो गए हैं, उनका नरक में नियत वास होता है—ऐसा हमने सुना है। अहो! हमने बड़ा पाप करने का निश्चय किया है, क्योंकि राज्य-सुख के लोभ से हम अपने स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं ।
1.46 – अर्जुन का निश्चय – युद्ध नहीं करूँगा
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
हिन्दी अर्थ: यदि धृतराष्ट्रपुत्र, शस्त्रधारी होकर, मुझे बिना प्रतिकार किए, निःशस्त्र युद्ध में मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा ।
1.47 – अर्जुन का रथ पर बैठ जाना
एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार कहकर अर्जुन युद्धभूमि में शोक-संतप्त मन से बाण-सहित धनुष त्यागकर रथ पर बैठ गए ।
अध्याय 2 – सांख्य योग
इस अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद भी अपने कर्तव्य के बारे में प्रश्न पूछते हैं और अंततः शिष्य बनकर आत्मसमर्पण कर देते हैं ।
2.4 – गुरुओं पर बाण कैसे चलाएँ?
अर्जुन उवाच –
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
हिन्दी अर्थ: हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय पुरुषों पर बाण कैसे चला सकता हूँ ?
2.5 – भिक्षा माँगना भी अच्छा
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
हिन्दी अर्थ: इन महानुभाव गुरुओं को बिना मारे, इस लोक में भिक्षा माँगना भी श्रेयस्कर है। क्योंकि इन गुरुओं को मारकर तो हमें रुधिर से सने हुए भोग ही भोगने पड़ेंगे ।
2.6 – विजय या पराजय – क्या श्रेष्ठ?
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
हिन्दी अर्थ: हम यह नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है—कि हम जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते, वे धृतराष्ट्रपुत्र हमारे सामने खड़े हैं ।
2.7 – अर्जुन का आत्मसमर्पण
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं दीनता के दोष से ग्रस्त हूँ और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि मोहित हो रही है। मैं आपसे पूछता हूँ—मेरे लिए जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। कृपया मुझे उपदेश दीजिए ।
2.8 – शोक का नाश न होना
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥
हिन्दी अर्थ: मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरे इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके—चाहे मुझे पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य मिल जाए या देवताओं का स्वामित्व भी ।
2.9 – मैं युद्ध नहीं करूँगा
संजय उवाच –
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
हिन्दी अर्थ: संजय कहते हैं—शत्रु-तापक अर्जुन ने हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से यह कहकर कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’, गोविन्द से कहा और चुप हो गए ।
2.54 – स्थितप्रज्ञ के लक्षण
अर्जुन उवाच –
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
हिन्दी अर्थ: हे केशव! समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ पुरुष की क्या भाषा होती है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है ?
अध्याय 3 – कर्म योग
इस अध्याय में अर्जुन को ज्ञान और कर्म के बीच भ्रम होता है, और वे पूछते हैं कि मनुष्य पाप क्यों करता है ।
3.1 – ज्ञान श्रेष्ठ तो कर्म में क्यों लगाएँ?
अर्जुन उवाच –
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
हिन्दी अर्थ: हे जनार्दन! यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस भयंकर कर्म (युद्ध) में क्यों लगा रहे हैं ?
3.2 – भ्रमित करने वाले वचन
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥
हिन्दी अर्थ: आपके वचन मुझे भ्रमित कर रहे हैं। कृपया एक निश्चित मार्ग बताइए जिससे मेरा कल्याण हो ।
3.36 – पाप करने के लिए क्या प्रेरित करता है?
अर्जुन उवाच –
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
हिन्दी अर्थ: हे वार्ष्णेय! मनुष्य अनिच्छा होते हुए भी, मानो बलात् प्रेरित होकर, किसके द्वारा पाप करता है ?
अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग
4.4 – कृष्ण की प्राचीनता पर प्रश्न
अर्जुन उवाच –
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥
हिन्दी अर्थ: आपका जन्म तो बाद में हुआ और विवस्वान् (सूर्य) का पहले। फिर आपने प्रारम्भ में यह ज्ञान उन्हें कैसे कहा—यह मैं कैसे समझूँ ?
अध्याय 5 – कर्म संन्यास योग
5.1 – संन्यास और कर्म में क्या श्रेष्ठ?
अर्जुन उवाच –
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की भी बात करते हैं और कर्मयोग की भी। इन दोनों में से मेरे लिए जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।
अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग
8.1-2 – आध्यात्मिक प्रश्न
अर्जुन उवाच –
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
हिन्दी अर्थ: हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत और अधिदैव क्या हैं? अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे स्थित है? तथा प्रयाणकाल में आपको नियत चित्त वाले पुरुष कैसे जान सकते हैं?
अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग
11.1 – विश्वरूप देखने की प्रार्थना
अर्जुन उवाच –
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभु! आपके द्वारा मुझ पर कृपा करके कहे गए परम गुह्य अध्यात्म-ज्ञान से मेरा यह मोह दूर हो गया है।
अध्याय 12 – भक्ति योग
12.1 – सगुण या निर्गुण उपासना?
अर्जुन उवाच –
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभु! जो भक्त आपका सगुण रूप में निरंतर ध्यान करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर (निर्गुण ब्रह्म) की उपासना करते हैं—इन दोनों में कौन अधिक योगी है?
निष्कर्ष
ये हैं अर्जुन के सभी 84 श्लोक जो पूरे गीता में बिखरे हुए हैं। अर्जुन के प्रश्न ही भगवद्गीता के 700 श्लोकों के उपदेश का आधार हैं—यदि अर्जुन ये प्रश्न न पूछते, तो गीता का अमूल्य ज्ञान संसार को न मिलता । अर्जुन का शिष्यत्व, विनम्रता और जिज्ञासा ही हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान तभी मिलता है जब हम श्रद्धा, प्रश्न और समर्पण के साथ गुरु की शरण में जाते हैं।
