🪔 श्री गुरु बृहस्पति व्रत कथा 🕉️
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरः”
— गुरु महिमा श्लोक
🙏 परिचय (Introduction)
गुरुवार का दिन देवगुरु बृहस्पति को समर्पित होता है। बृहस्पति देव को समस्त देवताओं का गुरु माना गया है। वे ज्ञान, धर्म, नीति, विवेक, विवाह, संतान और भाग्य के कारक हैं। जिनके जीवन में आर्थिक संकट, विवाह में विलंब, संतान की बाधा या बार-बार असफलता आती है, उनके लिए गुरुवार व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
यह व्रत केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि धैर्य, संयम और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण की साधना है। नीचे दी गई कथाएँ यह दर्शाती हैं कि जब मनुष्य सच्चे भाव से गुरु की शरण लेता है, तब उसका जीवन स्वयं बदलने लगता है।
🌸 कथा 1: निर्धन ब्राह्मण और गुरु कृपा
बहुत प्राचीन समय की बात है। एक छोटे से गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह वेद-शास्त्रों का ज्ञाता था, नियमित संध्या-वंदन करता था, परंतु उसके घर में दरिद्रता ने स्थायी निवास कर लिया था। उसका घर कच्चा था, छत से पानी टपकता था, कई-कई दिन ऐसे बीतते जब घर में अन्न का एक दाना भी नहीं होता।
उसकी पत्नी रोगग्रस्त रहती थी और संतान न होने का दुःख दोनों को भीतर से तोड़ देता था। फिर भी वह ब्राह्मण कभी ईश्वर से शिकायत नहीं करता था। उसका विश्वास था कि जब गुरु प्रसन्न होंगे, तब जीवन की दिशा स्वयं बदल जाएगी।
एक गुरुवार को गाँव में एक वृद्ध साधु आए। उनके मुख पर अद्भुत तेज और वाणी में गहरी शांति थी। ब्राह्मण ने उन्हें आदरपूर्वक अपने घर बुलाया। घर में देने को कुछ नहीं था, फिर भी उसने सूखे चावल उबालकर श्रद्धा से अर्पित किए।
साधु उसकी भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— “वत्स, तुम्हारे जीवन में गुरु तत्व दुर्बल है। यदि तुम श्रद्धा से गुरुवार व्रत करो, तो बृहस्पति देव अवश्य कृपा करेंगे।”
ब्राह्मण ने उसी क्षण संकल्प लिया। पहले गुरुवार घर में पीले वस्त्र नहीं थे, उसने पुरानी धोती को हल्दी से रंग लिया। चने की दाल नहीं थी, तो खेत से गिरे चने बीनकर लाया।
कई महीने बीत गए। कोई चमत्कार नहीं हुआ। पत्नी का धैर्य टूटने लगा, पर ब्राह्मण अडिग रहा। उसने कहा— “गुरु देर से देते हैं, पर गलत नहीं देते।”
एक रात उसे स्वप्न आया। पीले वस्त्रों में एक दिव्य पुरुष बोले— “वत्स, मैं तुम्हारी श्रद्धा से प्रसन्न हूँ।”
अगले दिन एक सेठ ने उसे बुलाया। सेठ ने कहा— “मुझे स्वप्न में आदेश मिला है कि मैं तुम्हारी सहायता करूँ।”
धीरे-धीरे ब्राह्मण को यज्ञ-कर्म मिलने लगे। धन आया। पत्नी स्वस्थ हुई। कुछ समय बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। ब्राह्मण ने जीवन भर गुरुवार व्रत नहीं छोड़ा।
🌼 कथा 2: अहंकारी राजा का पतन
एक राज्य में एक शक्तिशाली राजा शासन करता था। उसके पास अपार धन, विशाल सेना और मजबूत किला था। उसे अपने बल पर अत्यधिक गर्व था। वह गुरुओं और ब्राह्मणों को तुच्छ समझता था।
बृहस्पति देव ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और साधु का वेश धारण कर दरबार में पहुँचे। राजा ने कहा— “यदि तुम सच्चे साधु हो, तो कोई चमत्कार दिखाओ।”
साधु ने शांत स्वर में कहा— “राजन, गुरु की परीक्षा नहीं ली जाती।” राजा हँस पड़ा और उन्हें अपमानित कर बाहर निकाल दिया।
उसी दिन से राजा का पतन आरंभ हो गया। खजाना खाली होने लगा। राज्य में अकाल पड़ा। शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया।
एक रात राजा ने स्वप्न देखा— पीले वस्त्रों में एक दिव्य पुरुष बोले— “तुमने गुरु का अपमान किया है।”
राजा भयभीत हो उठा। उसने पश्चाताप किया और गुरुवार व्रत प्रारंभ किया। ब्राह्मणों से क्षमा माँगी।
कुछ ही समय में राज्य में वर्षा हुई। अकाल समाप्त हुआ। शांति लौट आई। राजा ने जीवन भर गुरु सम्मान का पालन किया।
🌺 कथा 3: निसंतान दंपति की मनोकामना
एक नगर में एक संपन्न दंपति रहता था। उनके पास धन, वैभव और मान-सम्मान था, परंतु संतान सुख नहीं था।
वर्षों तक उन्होंने अनेक उपाय किए, पर निराशा ही हाथ लगी। एक वृद्धा ने उन्हें गुरुवार व्रत का सुझाव दिया।
उन्होंने श्रद्धा से व्रत आरंभ किया। हर गुरुवार कथा सुनते, पीले पुष्प अर्पित करते।
कई महीने बीत गए। धैर्य की परीक्षा हुई। अंततः गुरु कृपा से पत्नी गर्भवती हुई।
पुत्र जन्म के साथ उनका जीवन पूर्ण हो गया। उन्होंने जीवन भर गुरुवार व्रत रखा।
🌹 कथा 4: विधवा स्त्री की अटूट आस्था
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से नगर के किनारे एक निर्धन विधवा स्त्री रहती थी। उसका जीवन अत्यंत कष्टों से भरा हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया था और युवावस्था में पति का देहांत हो गया। संसार की दृष्टि में वह स्त्री दुर्भाग्य की प्रतीक बन चुकी थी। समाज ने उसे अपनाने के बजाय उससे दूरी बना ली थी। पति के जाने के बाद उसके जीवन में अंधकार छा गया। न सिर पर छत ठीक से थी, न पेट भरने का साधन। दिन भर दूसरों के घरों में छोटा-मोटा काम कर वह दो समय की रोटी जुटाती थी। कई बार ऐसा भी होता कि उसे आधा पेट ही सोना पड़ता। फिर भी उसने कभी किसी के सामने हाथ फैलाकर भीख नहीं माँगी। सबसे बड़ा दुःख उसे समाज की उपेक्षा से होता था। लोग उसे अशुभ मानते थे। शुभ कार्यों में बुलाना तो दूर, उसके पास बैठना भी पसंद नहीं करते थे। परंतु इस अपमान ने उसके मन में कटुता नहीं भरी। उसने अपने दुःख को ईश्वर की इच्छा मान लिया था। उस स्त्री की एक ही पूँजी थी — उसकी अटूट आस्था। —
🌼 आस्था का दीपक
वह प्रतिदिन प्रातः स्नान कर अपने छोटे से घर में ईश्वर का स्मरण करती। उसके पास न मूर्ति थी, न दीपक, न अगरबत्ती। फिर भी वह मन-ही-मन ईश्वर से बात करती। उसे विश्वास था कि ईश्वर हृदय की भावना देखते हैं, बाहरी दिखावा नहीं। हर गुरुवार वह विशेष रूप से व्रत रखती थी। भले ही उसके पास खाने को कुछ न हो, पर गुरुवार को वह नमक नहीं खाती थी। कई बार तो पूरा दिन भूखी रहती, पर व्रत नहीं तोड़ती। लोग उसे समझाते— “इतनी गरीबी में व्रत से क्या मिलेगा?” पर वह मुस्कुरा कर कहती— “जब संसार ने कुछ नहीं दिया, तो गुरु ही मेरा सहारा हैं।” —🌿 जीवन की कठिन परीक्षा
एक वर्ष ऐसा आया जब नगर में भयंकर अकाल पड़ा। काम मिलना बंद हो गया। कई दिनों तक उसके घर चूल्हा नहीं जला। शरीर कमजोर होने लगा, पर मन की आस्था डगमगाई नहीं। एक गुरुवार की सुबह वह अत्यंत दुर्बल थी। खड़े होना भी कठिन था। पड़ोस की एक स्त्री ने व्यंग्य करते हुए कहा— “आज तो व्रत मत रखो, पहले जीवन बचाओ।” उस विधवा ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “यदि गुरु चाहेंगे, तो जीवन भी बचा रहेगा और व्रत भी पूरा होगा।” उस दिन उसने केवल थोड़ा सा जल पीकर व्रत रखा। संध्या होते-होते वह थक कर जमीन पर बैठ गई और आँखें बंद कर गुरु बृहस्पति का स्मरण करने लगी।
🌼 गुरु की परीक्षा
उसी समय एक वृद्ध ब्राह्मण उस मार्ग से गुज़रे। उनके वस्त्र साधारण थे, पर मुख पर दिव्य तेज था। उन्होंने उस स्त्री को देखा और पूछा— “बेटी, क्या तुम्हारे पास मुझे जल पिलाने के लिए कुछ है?” स्त्री के पास स्वयं पीने को भी जल नहीं था, फिर भी उसने तुरंत पास के कुएँ से जल लाकर उन्हें पिला दिया। ब्राह्मण ने फिर पूछा— “क्या तुम भूखी नहीं हो?” उसने सिर झुका कर कहा— “हाँ महाराज, पर आज गुरुवार है।” ब्राह्मण उसकी बात सुनकर मुस्कुराए। उन्होंने कहा— “तुम जानती हो कि तुम्हारी यह श्रद्धा कितनी महान है?” वह कुछ न बोली। ब्राह्मण ने उसे आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गए।
🌿 चमत्कार की शुरुआत
उस रात स्त्री ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसने देखा कि पीले वस्त्रों में एक दिव्य पुरुष उसके सामने खड़े हैं। उनके मुख पर करुणा और तेज दोनों थे। उन्होंने कहा— “वत्स, मैं तुम्हारी अटूट आस्था से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।” स्त्री की आँखें भर आईं। वह भूमि पर गिर पड़ी। दिव्य पुरुष बोले— “मैं देवगुरु बृहस्पति हूँ। तुमने अपमान, भूख और कष्ट सहकर भी व्रत नहीं छोड़ा। अब तुम्हारे जीवन में परिवर्तन होगा।”
🌼 जीवन का परिवर्तन
अगले ही दिन नगर के एक प्रतिष्ठित सेठ के घर से संदेश आया। सेठ की पत्नी बीमार थी और कोई भी उपाय सफल नहीं हो रहा था। सेठ ने स्वप्न में देखा था कि एक देवता ने कहा है— “उस विधवा स्त्री को बुलाओ, उसकी सेवा और प्रार्थना से रोग दूर होगा।” स्त्री भयभीत होते हुए सेठ के घर गई। उसने कुछ नहीं किया, केवल मन-ही-मन गुरु बृहस्पति का स्मरण किया। आश्चर्यजनक रूप से सेठ की पत्नी की तबीयत सुधरने लगी। सेठ ने प्रसन्न होकर उस विधवा को सम्मान दिया, वस्त्र और अन्न दिया और उसके लिए स्थायी काम की व्यवस्था कर दी।
🌿 सम्मान की प्राप्ति
धीरे-धीरे नगर में उसकी चर्चा होने लगी। जो लोग कभी उसे अशुभ कहते थे, वही अब उसका सम्मान करने लगे। लोग उससे आशीर्वाद लेने आने लगे। पर उस स्त्री के स्वभाव में कोई घमंड नहीं आया। वह आज भी उसी सादगी से गुरुवार व्रत रखती रही। अब वह भूखी नहीं रहती थी, पर उसने अपनी विनम्रता नहीं छोड़ी। वह कहती— “यह सब मेरा नहीं, गुरु की कृपा है।”
🌟 कथा की शिक्षा
यह कथा हमें सिखाती है— * सच्ची आस्था परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती * ईश्वर और गुरु भावना देखते हैं, स्थिति नहीं * अपमान सहकर भी जो धर्म पर अडिग रहता है, वही सच्चा भक्त है * गुरुवार व्रत धैर्य और विश्वास की परीक्षा है
🙏 उपसंहार
विधवा स्त्री की अटूट आस्था ने यह सिद्ध कर दिया कि जब मनुष्य पूर्ण श्रद्धा से गुरु की शरण लेता है, तो ईश्वर स्वयं उसके जीवन में उतर आते हैं।
🌼 निष्कर्ष (Conclusion)
गुरुवार व्रत कथा हमें सिखाती है कि
सच्ची श्रद्धा कभी निष्फल नहीं जाती।
🙏 ॐ बृहस्पतये नमः 🙏