मेरा स्वंम का मानना है धर्म का मतलब हमारा संस्कार और हमारा ज्ञान जो कुछ हमने बचपन से सीखा वही हमरा धर्म है, अर्थात हमारा संस्कृति ही हमारा धर्म है ।
अब बात आती है हमारी संस्कृति क्या है।
आप जिस भी दिनचर्या का पालन करते आ रहे हो बचपन से जो कुछ सीखा जो कुछ अपनाया वही आपका संस्कार है , और आपका संस्कार ही आपका धर्म है।
आपके किये कार्यो के हिसाब से आपके धर्म का परिभाषा बदल जाएग , जैसे अगर आपको आपका धर्म हिंसा करना सीखा रहा है तोह आपका धर्म आपको हिंसा के रास्ते दिखा रहा जिव हत्या भी हिंसा में आता है । वह हर कार्य जो प्रकृति के विपरीत होता है वह आपको विधर्मी बना देता है। यानि सही कार्यो से भटका हुए को विधर्मी बोलते है
अगर धर्म को संधि विच्छेद कर के समझे तोह , नाम मात्र से समझ सकते है आप धर्म का क्या मतलब होता है
धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘धारण करने योग्य’ सबसे उचित धारणा, अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिए, यह धर्म हैं। “” धर्म किसी के साथ भेद नहीं करता “”
धर्म का शाब्दिक अर्थ : धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है । ध + र् + म = धर्म | ध देवनागरी वर्णमाला 19वां अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत (धातु) धा + ड विशेषण धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किए हुए है। जैसे हम किसी नियम को, व्रत को धारण करते हैं इत्यादि । इसका मतलब धर्म का अर्थ है कि जो सबको धारण किए हुए है अर्थात धारयति- इति धर्म:!। अर्थात जो सबको संभाले हुए है। सवाल उठता है कि कौन क्या धारण किए हुए हैं? धारण करना सही भी हो सकता है और गलत भी।
आधुनिक धर्म क्या होता है।
आधुनिक धर्म वो धर्म है जो केवल धर्म का पालन न करके अपने संगठन का पालन कर रहा है।
धर्म और संगठन में क्या अंतर होता है
धर्म उसे कहते है जो धर्म के परिभाषा का पूर्णतः पालन करता हो, और संगठन उसे कहते है जो धर्म के बताये रास्ते का पालन न करके अपने बताये समूह और संस्कार का पालन करे उसे संगठन कहते hai.
धर्म क्या है
धर्म स्वयं सत्य का नाम है
धर्म अध्यात्म विज्ञान से निकला हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है कि जगत में जो कोई वस्तु, मार्ग, कर्तव्य एवं अन्य उत्तरदायित्व धारण करने के योग्य है वही धर्म है; संसार में धारण करने योग्य मात्र सत्य का मार्ग है, इसलिए स्वयं सत्य ही धर्म है। सत्य का अर्थ होता है जो सिद्धान्त शाश्वत है, सदा से है और सदैव रहेगा; जिसे मिटाया न जा सके। सत्य के विपरीत जो कुछ है वह अधर्म की श्रेणी में आ जाता है। विद्वान व्यक्ति धर्म की व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार से करते है, परंतु उनके मूल उद्देश्य में केवल सत्य मार्ग का पालन करना होता है, धर्म सही पथ पर चलते हुए जीवन निर्वाह करना है, यह परिवार एवं समाज के लोगों के बीच अच्छे संस्कार उत्पन्न करता है, फलस्वरूप व्यक्ति बुरे विचारों से सदैव दूर रहता है और शांति का अनुभव करता है। धार्मिक लोग अपने पथ से कभी भटकते नहीं है, जीवन में भयानक कष्ट आने पर भी वे सत्य मार्ग का पालन करते रहते है, और समाज में अपना सच्चा आदर्श स्थापित करते है।
धर्म को छोटे छोटे बिन्दुओ में समझे
मूल कर्तव्यों का पालन करना ही धर्म है। प्रकृति के प्रति प्रेम ही हमारा धर्म है। सभी जिव , मानव और जिव जन्तुओ के प्रेम ही हमारा धर्म है। सत्य के मार्ग पर चलना ही हमारा धर्म है। सभी जिव जन्तुओ को प्रेम और उपकार ही हमारा धर्म hai. समाज व राष्ट्र की रक्षा करना धर्म हैधर्म संतुलित जीवन जीने की कला हैंकर्तव्यों का पूर्णत पालन करना धर्म हैं
धारण करने योग्य क्या है?
सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, क्षमा आदि।.... ..बहुत से लोग कहते हैं कि धर्म के नियमों का पालन करना ही धर्म को धारण करना है जैसे ईश्वर प्राणिधान, संध्या वि वंदन, श्रावण माह व्रत, तीर्थ चार धाम, दान, मकर संक्रांति-कुंभ पर्व, पंच यज्ञ, सेवा कार्य, पूजा पाठ, 16 संस्कार और धर्म प्रचार आदि ।... लेकिन उत्त सभी कार्य व्यर्थ है जबकि आप सत्य के मार्ग पर नहीं ब्रू हो। सत्य को जाने से अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौचादि सभी स्वतः ही जाने जा सकते हैं। अतः सत्य ही धर्म है और धर्म ही सत्य है।... जो संप्रदाय, मजहब, रिलिजन और विश्वास सत्य को छोड़कर किसी अन्य रास्ते पर चल रही है वह सभी अधर्म के ही मार्ग हैं। इसीलिए हिन्दुत्व में कहा गया है सत्यंम शिवम सुंदरम ।